दिल्ली में इंडिया गेट जैसी हरी भरी जगह पर मुख्यमन्त्री शीला दीक्षित ने ए सी बस सेवा चला कर निम्न वर्ग को भी ए सी कार के मज़े देने की कोशिश कर के अपनी जगह पक्की करनी चाही है. पर गर्मी छोडती इन बसों से इण्डिया गेट का ठंडा वातावरण न सिर्फ गर्म ही होगा बल्कि सी एन जी का घातक धुंआ भी निकलेगा. फ़िलहाल राजपथ को शाम होते ही बैरिअर्स लगा कर बंद कर दिया जाता है और गाड़िया खाड़ी करने पर दनादन चालान कट रहे हैं. ऐसे में दिल्ली के थके हारे वासियों को शाम में सुकून लेने की जगह पर भी सरकार ने अतिक्रमण कर लिया है. करोड़ों रुपयों से सड़क के दोनों तरफ चार परतों में ऐसे पत्थर लगाए जा रहे है जिनका कोई औचित्य नहीं है, सिर्फ इसके कि इससे नेताओं और सरकारी कर्मचारियों की कमाई होगी. बैठने की घांस पर भी महिनों तक पानी डाल कर बैठने की जगह भी छीन ली गयी है. पेड़ों के नाम पर तो बस अन्ग्रेज़ों के ज़माने के पेड़ों से ही काम चल रहा है. सरकार चाहे तो जगह जगह फलों के पेड़ लगा सकती है जिससे की गर्मी में राहगीरों को और बच्चों को कुछ खाने को मिले. (यह सुझाव मेरे मित्र रितेश मल्होत्रा का दिया हुआ है जो की अति उत्तम है ). वैसे सरकार तो नई दिल्ली क्षेत्र में सरकारी ज़मीन पर लगे जामुनों के पेड़ों का भी ठेका दे कर दिल्ली वासियों को जामुन तक भी नसीब नहीं होने देती. उधर फलों के दाम इतने हैं की अब तो फल मिठाई से भी महंगे हो गए हैं.नेता और अमीर तो पांच सितारा होटलों में अपनी शामें रंगीन करते हैं या हिल स्टेशनों पर घुमते हैं. पर दिल्ली की गरीब और मध्यम वर्गीय जनता , जो कि दिन भर कठोर मेहनत करती है, उसके लिए तो, दिल्ली में शाम और रात गुज़ारने की राष्ट्रपति भवन के आगे बैठने की ज़मीन भी नहीं बची है. बोटिंग के लिए बनाई गई नहरों में पानी नहीं भरा जाता और न ही बोटिंग कि सुविधा है. सबसे बुरी बात यह है कि राजपथ के पार्कों के पिछले छोरों पर भी सड़क बनाई जा रही है, जिस से बैठने की एकमात्र शांत जगह भी नहीं बचेगी. अब शीला दीक्षित यह बताए की अगर दिल्ली वालों को सिर्फ ए सी बस में घूमने का ही शौक होता तो इंडिया गेट पर शाम बिताने क्यों आते ? वैसे भी शीला सरकार आक्सीजन छोड़ने की मशीन के नाम पर दो सौ करोड़ से ज्यादा का चूना लगाने की तैयारी में है. टाटा से ली गई , गर्मी छोड़ती बसों से तो वह पहले ही चूना लगा चुकी है. वाह री दिल्ली की कांग्रेसी सरकार और शीला दीक्षित, पेड़ तो लगा नहीं सकी, अब लगता है की दिल्ली के आसमान पर ए सी फिट करा कर ही मानेगी. हाँ यहाँ एक बात मैं और जोड़ना चाहुंगा कि दिन भर लोग इंडिया गेट पर आराम की चैन तो लेते हैं पर साथ में इतना कूड़ा - कचरा और गंदगी फेंक जाते हैं कि रात को सबके जाने के बाद तीन से चार किलोमीटर के क्षेत्र में कूड़ा बिखर जाता है. हालांकी कूड़ेदानों की मोज़ुदगी भरपूर है पर लोग उनमें कूड़ा न फेंक कर घांस के मैदान में ही कूड़ा, प्लास्टिक और थर्माकोल की थैलिया, इत्यादि छोड़ जाते हैं.
निखिल सबलानिया
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