Wednesday, March 31, 2010

शिक्षा को बेचने को तैयार कपिल सिब्बल

जहाँ एक तरफ देश में सरकारी स्कूल तेज़ी से बंद होते जा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ डीम विश्वविधाल्यों के छात्रों पर खतरे की घंटी मंडरा रही है. देश आज़ाद हुए ६२ वर्ष हो चुके हैं पर अभी तक चौदह वर्ष तक की उम्र के सभी बच्चों को शिक्षा देने में सरकार विफल रही है और राष्ट्रपति भवन से एक किलोमीटर दूर बाल मज़दूर कोका-कोला और पेप्सी बेचते नज़र आते हैं. ऐसे में देश का मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल विदेशी कालेजों को भारत में लाने की वकालत कर रहा है.

शहरों में लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के ख्याल से ही भयभीत हो जाते हैं और गाँवों में तो सरकारी स्कूलों की हालत हर स्तर पर खस्ता है. ऐसे में एक तरफ जहाँ शहरों में शिक्षा ने एक बड़े व्यापार का रूप ले लिया है जिसने कि आम आदमी की जेबें क़तर डाली है, वहीं गावों में शिक्षा केवल सरकार और उसके पिठ्ठुओं की कमाई का जरिया बन कर रह गयी है. ऐसे में अगर विदेशी कालेजों को भारत में बसा दिया गया तो न सिर्फ शिक्षा आम आदमी के हाथों से निकल जाएगी वरन जल्द ही बचे हुए सरकारी स्कूल और कालेज भी हो सकता है की विदेशी हाथों में चले जाएं. कुल मिला कर भारतीयों के लिए तो यह घाटे का सौदा ही होगा, पर हाँ कपिल सिब्बल के लिए हो सकता है की यह मुनाफे का सौदा साबित हो.

यदि गौर से देखा जाए तो कपिल सिब्बल का यह सुझाव भारतीयों के लिए अत्यंत घातक है. विदेशी कालेजों के यहाँ आने से यहाँ की शिक्षा और भी अधिक महँगी हो जाएगी. इससे भारत के हर वर्ग पर मार पड़ेगी. भारत में जो पिछड़ा वर्ग शिक्षा के माध्यम से उठ रहा है उस पर कपिल सिब्बल का यह सुझाव किसी करारे चांटे की तरह है, जिसके पड़ने पर आँखों के आगे अन्धेरा छा जाता है. यदि कपिल सिब्बल का यह सुझाव लागू हो जाता है तो एक तरफ जहाँ आगे बढ़ते गरीब वर्ग को अपना भविष्य किसी अन्धकार सा मालूम होगा वहीं दूसरी तरफ भारत का तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग खुद को सामंतवादी वर्ग में लाने के लिए इन्हीं विदेशी कालेजों में अपनी जेबें खाली करवाएगा और सामंतवादियों की नयी पीढ़ी को पैदा करेगा, जिनका लक्ष्य यही होगा कि कैसे शिक्षा पर खर्च की अपनी जीवन भर की कमाई को जल्दी से जल्दी सूद के साथ लोगों की जेबों से निकाला जाये. और उस समय सामंतवादियों की इस नई नस्ल के आगे दो ही रास्ते बचेंगे, एक, या तो एक भ्रष्ट सरकारी नेता, अफसर या कर्मचारी बन कर रिश्वत से धन अर्जित करो, या दूसरे यह कि एक भ्रष्ट व्यापारी बन कर देश की बाकी जनता को लूटो. ऐसे में चोट सब भारतवासियों पर ही पड़ेगी.

कपिल सिब्बल में यदि सही में दम है तो पहले देश भर में बंद होते सरकारी स्कूलों को रुकवाए और सरकारी स्कूलों को पढ़ने लायक बनवाये, प्राइवेट स्कूलों में जो पच्चीस प्रतिशत गरीब बच्चों के कोटे की जगह है उसमे गरीब बच्चों का दाखिला करवाए, प्राइवेट कालेजों और स्कूलों की बढती फ़ीस पर रोक लगवाये, भारत को अंग्रेजी से मुक्त करवाए, बाल मजदूर ख़त्म करवाए, देश से पलायन करते मेघावीं छात्रों, वैज्ञानिकों एवं शोधकर्ताओं के लिए अपने ही देश में अनुसंधान के अवसर पर्याप्त करवाए और सबसे पहले देश के बच्चों एवं नवयुवकों में अपने देश, उसकी भाषाएँ, संस्कृति एवं मूल्यों के प्रति आत्मसम्मान की भावना दिव्यमान करवाये, न कि हमारी आनेवाली पीढ़ियों को विदेशियों के हाथों न सिर्फ बेच ही दे वरन हमें हमेशा के लिए उनके रहमों करम पर छोड़ दे. अपने बच्चों को खुद पाला जाता है न कि गैरों के रहमों करम पर छोड़ दिया जाता है.

वैसे यह हमारे देश की विडम्बना ही है की एक तरफ जहाँ हमारे देश की आधी जनसंख्या बच्चों की है वहीँ दूसरी तरफ हमारे देश के बच्चों की शिक्षा को देखने के लिए न ही तो कोई शिक्षा मंत्री है और न ही कोई शिक्षा मंत्रालय.

निखिल सबलानिया

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