Saturday, April 17, 2010

चिदंबरम बना जनरल डायर


देश का गृह राज्य मंत्री चिदंबरम लोक सभा में आज लोगों को नक्सलियों के बारे में कोई भी ऐसा बयान देने से मना करता है जिससे की जवानों का मनोबल टूटे. सीधा - साधा अर्थ है की दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद में समूची जनता से चुप्पी साधने की बात कही जा रही है क्या यही लोकतंत्र है ? और क्या इस लोकतंत्र को उपजाने के लिए सरकार और गृह मंत्रालय के पास सिर्फ बदूक - तंत्र, पुलिस - तंत्र, बम्ब - तंत्र, या शायद फ़ौज - तंत्र ही बचा है ? ऐसे में मुझे जलियावाला बाग़ की बात याद आती है, जब अंग्रेजी जनरल डायर ने हिन्दुस्तानियों पर सम्मलेन बंद न करने पर गोलियां चलायी. विडम्बना है की तब का जनरल डायर हो या आज का चिदंबरम, गोली दागने वाला एक हिन्दुस्तानी सिपाही ही होता है, जो अपनों पर ही गोली दागता है.

नक्सल ग्रस्त क्षेत्र ही क्यों बल्कि आज देश का कौनसा ऐसा क्षेत्र है जहाँ सरकार सफल हो पाई है. चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो, गरीबों का और मजदूर वर्ग का विकास हो, वृद्धों की पेंशन हो, अनाथ बचों का भविष्य, शहरों में सुरक्षा का मामला हो, लघु उद्योगों का विकास हो, भ्रष्टाचार का जाल हो, रिश्वतखोरी का तंत्र हो, आजादी के तरेसठ वर्षों बाद भी आज हमारे देश की जनता इन सब और न जाने ऐसे कितने ही क्रूर तंत्रों में पीसी जा रही है. ऐसे में हमारे देश के नेता, जनता और सरकार किस मुंह से नक्सलियों से कहेंगे की वह उन्हें एक अच्छा जीवन दे सकते हैं.

मज़दूर और गरीब वर्ग एक से दूसरी पीढ़ी और तीसरी और फिर चौथी पीढ़ी में, आज़ादी के बाद पिसा जा रहा है. हाँ यह बात अलग है कि हमारा देश पूंजीपतियों और भ्रष्ट सरकारी नौकरों और नेताओं के लिए ज़रूर सोने की खान से कम नहीं है. ऐसे में क्या बंदूक और बारूद ही चिदंबरम को नज़र आते हैं जिनसे की इस देश का विकास हो पाए.

अंग्रेजों के आगमन के बाद ही भारतीय अर्थ व्यवस्था कृषि प्रधान से प्रौध्योगिक अर्थव्यवस्था बन गयी थी. भारत के समस्त भूखंड को फक्ट्रियों के दैत्यों की भूख मिटने के लिए शोषित किया जाने लगा. ज़मीन से ले कर असमान तक इन फक्ट्रियों की बलि चढ़ गए. समस्त वन्य जीवन, पेड़ - पौधे, जीव - जंतु, सब नष्ट हो गए. नदियाँ ज़हर उगलने लगी और हवा हिटलर के विष चेम्बरों जैसी प्रदूषित हो गयी. शिल्पी मजदूर बन गए और उद्योगपति एक ऐसे राजा बन गए जिनके पास समाज का वह ज़हरीला पदार्थ आ गया जिसे कहते है पैसा, जिससे न सिर्फ उन्होंने सरकारें खरीदी बल्कि किसी देश कि सशस्त्र पुलिस बल और सेना बल भी उनके कब्जे में आ गयी. और इस भारत में जीव - जंतु और समस्त वन्यजीवन और इंसानों के संहार का तांडव शुरू हो गया.

आज भी यह तांडव चल रहा है. चाहे जीतनी भी फक्ट्रियोँ लगा लें, मजदूर मजदूर ही रहेगा और गरीब गरीब ही. क्योंकि उस मजदूर और गरीब ने अपना भविष्य जिन नेताओं के हाथों दिया है वह पूंजीपतियों के हाथों बीके हुए है.

अगर चिदंबरम में सही में दम है तो देश की नदियों का पानी साफ़ कराये, फक्ट्रियों से निकलता गंदा धुंआ रुकवाए, देश में क्षिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य समस्याओं को हल करवाए.

नक्सली कही आस्मां से नहीं उतारे है. वह उसी ज़मीन के बाशिंदे है जिसके लिए वह लड़ रहे हैं, और किसी को भी अपने घर में घुसपैठियों से सुरक्षा करने का अधिकार है, और यह न सिर्फ भारत सरकार बल्कि विश्व की सभी सरकारों का लागू किया और नैसर्गिक है. इस बात को चिदंबरम समझे.

हमारे देश के नेता अमेरिकी सभ्यता के नक़्शे कदमों पर चलने वाली विश्व अर्थव्यवस्था और फैक्ट्रियों कि कठपुतली न बने और न ही अमरीकी माया लोगों की तरह खुद के देश के लोगों का नरसंहार न करे.

निखिल सबलानिया

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