न्यायमूर्ति बीएस चौहान और स्वतन्त्र कुमार की खंड्पीठ ने बिन ब्याहे ही एक छत के नीचे रहने वाले दम्पति से जन्मी सन्तान को उसके माता पिता की स्वार्जित सम्पत्ति में ही हिसा पाने का हकदार बता कर पैत्रिक सम्पति में उसे कोई हिस्सा नहीं देने का एक नृशंस, अमानवीय और महिला विरोधी फैसला सुनाया है.
यह फैसला अत्याधिक चौंका देने वाला है, जबकि आज समाज के यौन सम्बन्धित आचार विचार इतने अधिक बदल रहे हैं की विवाह पूर्व यौन सम्बन्ध एक आवश्यकता बन गया है. और ऐसे में यदि एक इन्सान का जन्म हो जाता है तो क्या समाज का दायित्व यही है की वह हराम की औलाद कहलाए. यदि उसे पैत्रिक सम्पति से वर्जित किया जाता है तो वह समाज में हराम की औलाद ही कहलाएगा या कहलाएगी. भारतीय न्याय व्यवस्था के उच्च्तम्म शिखर से यह फैसला ऐसा है की मानो मारने के बाद किसी लाश को चाकुओं और छुरों से गोद कर उसके रक्त की एक एक बूंद निकाली जा रही हो. इस फैसले के बाद यदि सहजीवन से जन्मी सन्तान को उसकी पैत्रिक सम्पति में से हक नहीं मिलता तो उस व्यक्ति का जीवन ऐसी ही जिन्दा लाश के समान हो जाएगा. सम्पति का हक सामाजिक व्यवस्था, सोच एवं समिकर्नों में आर्थिक नहीं वरण सामाजिक और व्यैक्तिक है. जरा उस इन्सान की मानसिकता के बारे में सोचिए की जिसे समाज हराम की औलाद कहेगा. क्या ऐसा फैसला सुनाते हुए न्यायाधिशों ने यह सोचा की वह भविष्य में किस प्रकार की लाशों को जन्म दे रहे हैं ? ऐसा फैसला तो अनन्त हत्याओं से भी बुरा है. इस फैसले से अनेको इन्सानों का जीवन, पल-पल घुट-घुट कर अपने प्राण देगा. यह समाज जो की इन्सान के लिए स्वतन्त्रता से जीवन जीने और परस्पर मधुर मानवीय सम्बन्ध बनाने के लिए है, वही समाज ऐसे प्राणी के लिए एक काल-कोठरी की जेल बन जाएगा, जहाँ से या तो वह दूर भागना चाहेंगे या जीवन के हर सम्बन्ध उनके ले एक दुस्वपन्न बन जएंगे.
यह फैसला अत्यन्त ही महिला विरोधी है. यह फैसला न केवल समाज के अमीर वर्ग के पुरषों को बाकी वर्गों की कन्याओं एवं महिलाओं का यौन शोषण करने के लिए भारत सरकार का मान्यता प्राप्त प्रमाणपत्र (सर्टिफिकेट) है, बल्कि भारतीय समाज के सभी पुरुषों को भारत सरकार का खुला आमन्त्रण है की आओ और हराम के भारतीय पैदा करो. इस फैसले के बाद सहजीवन के दौरान किया यौन सम्बन्ध, एक मधुर यौन सम्बन्ध न हो कर नारी का यौन शोषण है. इस फैसले से भारतीय समाज की पुरुष प्रधानता का और भारतीय परुष का महिला को पैर की जूती मानने कि मानसिकता का एक बार फिर से नृशंस उद्घटन होता है. इस फैसले से भारतीय समाज की गहराई में जा चुकी हिन्दु मनुवादी सोच की 'नारी ताडन (पिटाई, शोषण) की अधिकारी है, का एक काला सच् सामने आता है.
ऐसा फैसला भारतीय समाज के पुरषों एवं भारतीय समाज की नपुंसकता का प्रमाणपत्र है. ऐसे न्यायाधिशों को एक बार प्रकाश मेहरा की फिल्म 'लावारिस' देखनी चाहिए, जिसमें की निर्देशक ने भारतीय समाज में हरामी कहलाए जाने वाली सन्तान की करुण मनोवस्था और सामाजिक संघर्ष का अत्यन्त सुक्ष्म चित्रण किया है.
क्या ऐसे फैसलों में मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों को नहीं शामिल किया जाना चाहिए ?
क्या हमारी न्याय व्यवस्था एक दम खोखली है जहाँ काले कोट में बैठा इन्सान अपने एक फैसले से अनेकों जिन्दगियाँ बर्बाद कर देता है ?
निखिल सबलानिया
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